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कैसे बुना क्रिसमस ट्री
इस पहल के पीछे है क्रोसेट कलेक्टिव नाम का समूह शामिल है, जिसकी सह-स्थापना कलाकार शीना परेरा, शर्मिला मजूमदार और सोफी सिवरामन ने की। इस ग्रुप का उद्देश्य साफ था, क्रिसमस के मूल भाव खुशी, शांति, प्रेम और उम्मीद को किसी अलग रूप में सामने लाना। लेकिन यह प्रोजेक्ट जल्द ही एक आर्ट इंस्टॉलेशन से कहीं बड़ा आंदोलन बन गया।
क्रोसेट क्रिसमस ट्री क्यों है खास
ऊन से बने इस क्रिसमस ट्री को तैयार करने में तीन महीने का वक्त लगा। गोवा के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ी 25 महिलाओं ने 1000 स्क्वेयर का 18 फीट ऊंचा पेड़ बुना। इस सामुहिक कार्य में लगीं ज्यादातर महिलाएं एक-दूसरे को जानती तक नहीं थीं। कोई रोज़गार में व्यस्त, कोई गृहिणी तो कोई कलाकार था। तीन महीने तक ये महिलाएं अपने-अपने घरों में बैठकर क्रोशिया करती रहीं, फिर चाहे बिजली कटे या मानसून की नमी से जूझना पड़ा हो। इस दौरान हर महीने में वे आपस में किसी एक के घर पर मिलतीं और चाय नाश्ते के साथ अपनी अपनी कहानियां शेयर करतीं। ऊन की हर गांठ के साथ, अजनबी महिलाएं एक-दूसरे की साथी बनती चली गईं।
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जब पहली बार आमने-सामने आईं 25 महिलाएं
जब ट्री को असेंबल करने का वक्त आया, तब ये महिलाएं पहली बार एक साथ मिलीं। उनके हाथों में थे 1000 यूनिक स्क्वेयर, हर एक अलग जैसे उनकी ज़िंदगी। इन स्क्वेयर को मेटल फ्रेम पर परत-दर-परत चढ़ाया गया। इसमें न तो कोई पैटर्न तय था और ना ही कोई परफेक्शन था। क्योंकि ज़िंदगी भी ऐसी ही होती है अपूर्ण, असमान, लेकिन खूबसूरत। यह कहानी बताती है कि महिलाएं जब साथ आती हैं, तो कला भी सामूहिक हो जाती है। अगर आप गोवा जा रहे हैं तो 18 जनवरी तक इसका प्रदर्शन गोवा म्यूजियम में हो रहा है, जहां आप क्रोशिया से बने इस क्रिसमस ट्री को देख सकते हैं।