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क्या है ‘नौवें बम’ का मामला?
13 मई 2008 को जयपुर में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने पूरे देश को दहला दिया था. इन धमाकों में 71 बेगुनाहों की जान गई थी, और 185 लोग घायल हुए थे. पुलिस को चांदपोल बाजार के पास एक 9वां बम भी मिला था, जिसे फटने से महज 15 मिनट पहले डिफ्यूज कर दिया गया था. इसी ‘जिंदा बम’ मामले में विशेष अदालत ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी है.
‘जब 8 केस में बरी, तो यहां क्यों नहीं?’
दोषियों के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट पहले ही मुख्य 8 ब्लास्ट मामलों में उन्हें बरी कर चुका है. ऐसे में ‘जिंदा बम’ मामले में भी उन्हें राहत मिलनी चाहिए. उन्होंने दलील दी कि अपील पर सुनवाई में लंबा समय लग सकता है, इसलिए उनकी सजा पर रोक लगाकर उन्हें जमानत दी जाए.
ई-मेल बना मुख्य सबूत
राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए इन दलीलों का पुरजोर विरोध किया गया. सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया कि इन आरोपियों के खिलाफ पुख्ता और अतिरिक्त साक्ष्य मौजूद हैं. धमाकों के तुरंत बाद दो न्यूज चैनलों को ई-मेल भेजकर इन लोगों ने धमाकों की जिम्मेदारी ली थी. ई-मेल के जरिए धमाकों को ‘सही’ ठहराना इनके शामिल होने का बड़ा प्रमाण है.
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अदालत का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि मामले की गंभीरता को देखते हुए फिलहाल सजा पर रोक लगाना सही नहीं होगा. इस फैसले के बाद अब सरवर और शाहबाज को जेल की सलाखों के पीछे ही रहना होगा.