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हालांकि, सारांश ने रिकॉर्डबुक के ये आंकड़े तीसरे दिन मंगलवार को ही बदल दिए थे, लेकिन वह बुधवार को भी वह एक और विकेट लेने में सफल रहे. कुल मिलाकर सारांश ने फेंके 20.4 ओवरों में 49 रन देकर 2 विकेट चटकाए. चलिए जान लीजिए कि भारत के करीब 94 साल के टेस्ट इतिहास में वो शीर्ष पांच गेंदबाज कौन हैं, जिन्होंने देश के लिए सबसे ज्यादा उम्र में पहला विकेट लिया.
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विकेट के समय उम्र |
बनाम |
खास बात |
| रुस्तमजी जमशेदजी |
41 साल, 27 दिन |
इंग्लैंड, मुंबई, 1933 |
बाएं हाथ के स्पिनर, इकलौते टेस्ट में 137 रन देकर 3 विकेट लिए |
| आमिर इलाही |
बनाम ऑस्ट्रेलिया, सिडनी, 1947 |
ऑस्ट्रेलिया, सिडनी, 1947 |
लेग स्पिनर, भारत के लिए खेलने के बाद बाद में पाकिस्तान चले गए |
| केकी तारापोर |
37 साल, 329 दिन |
बनाम वेस्टइंडीज, दिल्ली, 1948 |
बाएं हाथ के स्पिनर, करियर में सिर्फ एक टेस्ट मैच खेला |
| श्यूट बनर्जी |
37 साल, 124 दिन |
बनाम वेस्टइंडीज, मुंबई, 1949 |
तेज-मध्यम गति के गेंदबाज, मैच में शानदार 5 विकेट चटकाए |
| सारांश जैन |
33 साल, 145 दिन |
बनाम श्रीलंका, कोलंबो, 2026 |
ऑफ-स्पिनर, 21वीं सदी में भारत के सबसे उम्रदराज टेस्ट डेब्यू करने वाले खिलाड़ी |
सारांश जैन के जीवन की 5 बड़ी बातें
सारांश जैन का भारतीय टेस्ट टीम तक का सफर बेहद भावुक और प्रेरणादायी है. 33 वर्ष की उम्र में बिना किसी आईपीएल चकाचौंध के भारतीय टीम में शामिल होकर टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले इस खिलाड़ी के बारे में कुछ ऐसी अनकही और अनसुनी बातें जो उनके संघर्ष को बयां करती हैं:पारिवारिक सपने और बड़ा बलिदान
क्रिकेट विरासत का सपना
सारांश के पिता सुबोध जैन स्वयं मध्य प्रदेश के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेल चुके थे. उनका सपना भारत के लिए खेलने का था, जो पूरा नहीं हुआ, तो उन्होंने यही सपना अपने बेटों में देखा.
बड़े भाई से ट्रांसफर हुआ सपना
शुरुआत में सारांश के बड़े भाई को परिवार की मुख्य क्रिकेट उम्मीद माना जाता था. जब बड़े भाई का करियर आगे नहीं बढ़ पाया, तब पूरा ध्यान और उम्मीदें सारांश पर टिक गईं.
पिता की बीमारी और छुपाया गया सच
जब सारांश अपने शुरुआती दिनों में ऑस्ट्रेलिया दौरे पर थे, तब भारत में उनके पिता को ओरल (मुंह का) कैंसर का पता चला और उनकी सर्जरी हुई. सारांश का खेल प्रभावित न हो, इसलिए परिवार ने यह बात उनसे तब तक छुपाई जब तक वे वापस घर नहीं लौट आए
चिट्ठी का वो अनमोल टुकड़ा
सर्जरी के बाद पिता सुबोध जैन ठीक से बोल नहीं पाते थे। उन्होंने कागज पर लिखकर सारांश को केवल अपने क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करने को कहा. पिता की वह लिखी हुई चिट्ठी आज भी सारांश के पास उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा के रूप में सुरक्षित है,
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सरकारी नौकरी का संघर्ष
घरेलू क्रिकेट के शुरुआती दिनों में जब क्रिकेट से पर्याप्त आय नहीं हो रही थी, तब सारांश ने सरकारी नौकरी करने का फैसला लिया. वे इंडिया पोस्ट (भारतीय डाक) में काम करते थे, जहां सुबह फाइलों और डाक को संभालते थे और शाम को सीधे नेट्स में पसीना बहाते थे.