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बचपन से संघर्ष, लेकिन सपनों से समझौता नहीं
शीतल देवी का जन्म बिना दोनों हाथों के हुआ। साधारण परिवार, सीमित संसाधन और पहाड़ी क्षेत्र की चुनौतियां, ये सब उनके रास्ते में थीं। लेकिन परिवार के सहयोग और कोचिंग की सही दिशा ने उनकी जिंदगी बदल दी। खेलों में रुचि ने उन्हें आर्चरी तक पहुंचाया। जहां तीरंदाजी आमतौर पर हाथों से की जाती है, वहीं शीतल ने अपने पैरों और कंधे की मदद से तीर चलाने की तकनीक विकसित की।
कैसे चलाती हैं तीर?
शीतल देवी विशेष तकनीक से पैरों से धनुष पकड़ती हैं। कंधे और जबड़े की मदद से डोरी खींचती हैं। संतुलन और फोकस से सटीक निशाना साधती हैं। उनकी यह तकनीक न सिर्फ अनोखी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय भी बनी।
एशियन पैरा गेम्स में ऐतिहासिक प्रदर्शन
शीतल देवी ने एशियन पैरा गेम्स में शानदार प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इतनी कम उम्र में अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह उपलब्धि उन्हें देश की सबसे चर्चित पैरा-एथलीट्स में शामिल करती है।
Women Of Excellence Award क्यों खास है?
वोग इंडिया द्वारा आयोजित वुमेन आफ एक्सेलेंस का उद्देश्य उन महिलाओं को सम्मानित करना है जिन्होंने अपने क्षेत्र में बदलाव की मिसाल पेश की है चाहे वह खेल हो, कला, उद्यमिता या सामाजिक प्रभाव। इस प्रतिष्ठित मंच पर शीतल देवी को मिला सम्मान इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने सिर्फ मेडल नहीं जीते, बल्कि मानसिक सीमाओं को भी तोड़ा है।
शीतल देवी की उपलब्धियां
- एशियन पैरा गेम्स में गोल्ड
- अंतरराष्ट्रीय पैरा-आर्चरी प्रतियोगिताओं में पदक
- भारत की सबसे युवा पैरा-आर्चरी सितारों में शामिल
- राष्ट्रीय स्तर पर कई सम्मान
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क्यों प्रेरणादायक हैं शीतल देवी?
- शारीरिक चुनौती के बावजूद आत्मविश्वास
- कठिन परिस्थितियों में अभ्यास
- मानसिक मजबूती और अनुशासन
- युवाओं, खासकर दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए रोल मॉडल
- शीतल देवी सिर्फ निशाना नहीं साधतीं। वे उम्मीद, साहस और सपनों को दिशा देती हैं।