RBSE 10th Result 2026: राजस्थान में दो सरकारी स्कूल का 10वीं बोर्ड में रिजल्ट जीरो, एक भी छात्र नहीं हुआ पास
पोलियो से संघर्ष की शुरुआत
डॉ. रुपिंदर बचपन में ही पोलियो की चपेट में आ गई थीं। महज चार साल की उम्र में उन्हें पोस्ट पोलियो पैरालिसस हो गया। यह वह दौर था जब बीमारी सिर्फ शरीर को नहीं, सपनों को भी जकड़ लेती थी। चलने-फिरने में कठिनाई, लगातार इलाज और समाज की दबी हुई सहानुभूति, इन सबने जीवन को आसान नहीं रहने दिया। लेकिन यहीं से उनके जीवन की दिशा तय हुई। जहां कई लोग हालात के आगे झुक जाते हैं, वहीं डॉ. रुपिंदर ने तय किया कि वे बीमारी का नहीं, ज्ञान का सहारा लेंगी। उनके कदम किसी बीमारी के कारण रुकेंगे , बल्कि वह अपने सपनों को पूरा करेंगी।
राजस्थान में फ्री इलाज का बड़ा अपडेट: छुट्टी के दिन भी 43 हजार मरीजों का हुआ इलाज, कार्ड धारकों के लिए नई सुविधा लागू
शिक्षा को बनाया हथियार
शारीरिक सीमाओं के बावजूद रुपिंदर ने पढ़ाई जारी रखी। कठिन परिस्थितियों में स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई कर आयुर्वेद चिकित्सा को जीवन का लक्ष्य बनाया। लोगों ने कहा, “जो खुद छड़ी लेकर चलती है, वो इलाज क्या करेगी?” लेकिन आयुर्वेद ने उन्हें इलाज का रास्ता दिखाया। पर आज डाॅ. रुपिंदर न सिर्फ इलाज करती हैं, बल्कि अपनी ज़िंदगी को अपनी शर्त पर भी जीती हैं। ये कहानी है हिम्मत, उम्मीद और इंसानियत की जो सिखाती है कि विकलांगता बोझ नहीं, ताकत बन सकती है। आखिरकार डॉ. रुपिंदर आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर बनीं। यह नियुक्ति सिर्फ एक पद नहीं थी, बल्कि उन तमाम धारणाओं की हार थी जो विकलांगता को असमर्थता समझती हैं।