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कौन हैं नीर आर्या?
उत्तर प्रदेश के एक संपन्न परिवार में जन्मी नीरा आर्य के सामने सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन था। लेकिन उन्होंने सुविधा नहीं, स्वतंत्रता चुनी। वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ीं और आज़ाद हिंद फौज की पहली महिला रेजीमेंट का हिस्सा बनीं। पर्दे के पीछे रहकर उन्होंने जासूसी का जोखिमभरा काम किया, जहाँ एक गलती की कीमत जान होती है।
राष्ट्र के लिए परिवार का बलिदान
उनकी निजी ज़िंदगी भी संघर्ष का मैदान बन गई। उनका विवाह एक ब्रिटिश इंडियन आर्मी अधिकारी से हुआ, जो गुप्त रूप से अंग्रेज़ों के लिए काम करता था। एक दिन उसने नीरा का पीछा करते हुए नेताजी की बैठक पर हमला किया, जिसमें नेताजी के ड्राइवर की मृत्यु हो गई। नेताजी और आंदोलन को बचाने के लिए नीरा ने अपने ही पति को मार दिया। यह फैसला किसी पत्थर दिल का नहीं, बल्कि राष्ट्र को परिवार से ऊपर रखने वाली स्त्री का था।
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अंग्रेजों ने दी जेल मे यातनाएं
इसके बाद जेल, यातनाएं और अमानवीय अत्याचार आए। अंग्रेज़ अफसरों ने उनसे आज़ादी के सेनानियों के रहस्य उगलवाने की कोशिश की। भयानक शारीरिक यातनाओं के बावजूद नीरा आर्य ने एक शब्द नहीं कहा। उनकी आवाज में दर्द था, चीख थी, लेकिन देशद्रोह नहीं।
1947 में आज़ादी मिली। नीरा आर्य जेल से रिहा हुईं पर न सम्मान मिला, न पदक और ही ना ही कोई पेंशन। वे हैदराबाद की सड़कों पर फूल बेचकर जीवन चलाने को मजबूर हुईं। 1998 में वे चुपचाप इस दुनिया से चली गईं। नीरा आर्य ने कुछ मांगा नहीं। उन्होंने सिर्फ दिया, अपना जीवन, अपना सुख और अपना भविष्य।