women mental health Alert : घड़ी का अलार्म बजते ही श्रेया रोज की तरह अपनी दिनचर्या में जुट गई। वह सब कुछ सहजता से संभाल रही थी, तभी भाई का फोन आया। उसने बताया कि फिर से उसका जॉब में सेलेक्शन नहीं हुआ। यह सुनकर श्रेया का मन बेचैन हो गया। अमेरिका की मार्केट रिसर्च कंपनी टॉकर रिसर्च का हाल ही का अध्ययन बताता है कि 73 प्रतिशत महिलाएं अपने प्रियजनों की चिंता में मानसिक और शारीरिक रूप से भागीदार बनती हैं। वे सिर्फ सहानुभूति नहीं जतातीं, बल्कि मदद के लिए सक्रिय भी होती हैं।
क्यों होती है चिंता
दोस्तों, परिवार या रिश्तेदारों की चिंता करना स्वाभाविक है, लेकिन महिलाएं इसमें भावनात्मक रूप से अधिक गहराई से जुड़ जाती हैं। अध्ययन के अनुसार, इसका एक बड़ा कारण सामाजिक दबाव और रिश्तों की जिम्मेदारी है। महिलाओं को डर होता है कि अगर वे संकट में अपनों का साथ नहीं देंगी तो समाज में उनकी छवि खराब हो जाएगी। साथ ही अगर आज वे दूसरों के दुख में शरीक नहीं होंगी तो कल उनके साथ कौन होगा। महिलाएं रिश्तों को लेकर पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं, इसलिए दूसरों के तनाव में भी खुद को सहज रूप से शामिल कर लेती हैं।
अपना दुख साझा न करना
महिलाएं दूसरों के दुख को अपने दिल में समेट लेती हैं और अक्सर अपनी भावनाओं को छुपा कर रखती हैं, ताकि परिवार में कोई परेशानी न हो। अध्ययन के अनुसार, केवल 18 प्रतिशत महिलाएं अपनी चिंता पति या परिवार के साथ साझा करती हैं। 52 प्रतिशत महिलाएं अंदर से परेशान होने के बावजूद बाहर से ठीक होने का दिखावा करती हैं। वे यह सोचती हैं कि वे अकेले ही समस्या का समाधान निकाल लेंगी, भले ही इसके लिए उन्हें भीतर से बहुत घुटन सहनी पड़े। इस वजह से उनकी मानसिक चिंता और तनाव बढ़ जाता है।
ये स्वभाव का मामला है
चिंता करना महिलाओं के स्वभाव का हिस्सा है। बच्चे को मामूली चोट लगने पर भी घर की महिलाएं सबसे पहले और ज्यादा चिंता जताती हैं। यहां तक कि जब कोई बाहरी तनाव न भी हो, तब भी महिलाएं किसी न किसी व्यक्तिगत चिंता में डूबी रहती हैं। अध्ययन बताता है कि एक सामान्य महिला रोजाना औसतन पांच घंटे तनाव में बिताती है, खासकर युवा पीढ़ी की महिलाएं, जैसे जेनरेशन जेड (1997-2012 के बीच जन्मीं) और मिलेनियल (1981 से 1996 के बीच जन्मीं) प्रतिदिन लगभग छह घंटे तनाव महसूस करती हैं।
कब शुरू होता है तनाव
आज की कामकाजी महिलाओं की जिंदगी एक दौड़ती ट्रेन जैसी हो गई है, जिसमें एक काम खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाता है। अध्ययन भी बताता है कि 15 प्रतिशत महिलाएं बिस्तर से उठते ही तनाव महसूस करती हैं, जबकि 10 प्रतिशत सुबह के कामकाज के दौरान तनाव में आ जाती हैं। ऐसे में अगर किसी दोस्त या रिश्तेदार की परेशानी से जुड़ा कॉल या मैसेज आ जाए तो मानसिक बोझ और बढ़ जाता है। यह स्थिति खासकर जेनरेशन एक्स (1965-1980 के बीच जन्मीं) की महिलाओं में सबसे लंबे समय तक बनी रहती है।
ये ‘कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन’ है
गंगाराम अस्पताल, दिल्ली में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आरती आनंद बताती हैं, परिवार, रिश्तेदार या दोस्तों की चिंता से परेशान होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि महिलाएं दूसरों की परेशानी को अपने साथ जोड़कर सोचने लगती हैं। मसलन, यदि किसी के पति का एक्सीडेंट हो जाए तो वे यह कल्पना करने लगती हैं कि अगर यह घटना उनके साथ होती तो क्या होता। यह सोच उन्हें और अधिक मानसिक तनाव में डाल देती है। इसे ‘कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन’ कहा जाता है। ऐसी स्थिति में नकारात्मक सोचने के बजाय अगर संभव हो तो पीड़ित की मदद करने पर ध्यान दें। साथ ही तनाव कम करने के उपाय अपनाएं, जैसे कि मन की बात दोस्तों से साझा करना या डायरी में लिखना। पॉजिटिव सोचें और भविष्य की कल्पनाओं में उलझने की जगह वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें।


