राजस्थान के बाड़मेर की रहने वाली रूमा देवी की कहानी संघर्ष, हौसले और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। बचपन में मां का साया सिर से उठ गया। आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छूट गई। पानी के लिए मीलों पैदल चलना पड़ा और कम उम्र में बाल विवाह का सामना करना पड़ा। शादी के महज 48 घंटे बाद मासूम बेटे को खोने का दुख भी झेलना पड़ा। जिंदगी ने उन्हें कई मुश्किलों से गुजरने पर मजबूर किया, लेकिन रूमा देवी ने हार मानने के बजाय अपने हुनर को अपनी ताकत बनाया।
कभी उनकी पहली कमाई महज 20 रुपये थी। आज वह 50 हजार से ज्यादा महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ने के लिए जानी जाती हैं। पारंपरिक कढ़ाई और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए उन्हें साल 2018 में राष्ट्रपति के हाथों नारी शक्ति पुरस्कार भी मिल चुका है।
10 महिलाओं से शुरू हुआ सफर
रूमा देवी ने करीब दो दशक पहले सिर्फ 10 महिलाओं के साथ मिलकर कढ़ाई और कसीदाकारी का काम शुरू किया था। उन्होंने राजस्थान के पारंपरिक कपड़ों को अपने काम का आधार बनाया। समूह की प्रत्येक महिला ने 100-100 रुपये का योगदान दिया और कुल 1,000 रुपये में सेकेंड हैंड सिलाई मशीन खरीदी।
छोटे स्तर से शुरू हुआ यह प्रयास धीरे-धीरे बड़े अभियान में बदल गया। महिलाओं को प्रशिक्षण देने के साथ उन्हें काम के लिए जरूरी कच्चा माल उपलब्ध कराया गया और तैयार उत्पादों की मार्केटिंग की जिम्मेदारी भी संभाली गई।
2008 में रखी संस्थान की नींव
रूमा देवी ने साल 2008 में ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान की स्थापना की। इसके जरिए बाड़मेर, बीकानेर और जैसलमेर के आसपास के गांवों में महिलाओं के समूह तैयार किए गए। संस्थान ने महिलाओं को प्रशिक्षण और कच्चा माल उपलब्ध कराया, ताकि वे अपने घर से ही काम कर सकें।
साल 2022 तक करीब 22 हजार महिलाएं इस पहल से अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार से जुड़ी थीं। अब यह संख्या बढ़कर 50 हजार से ज्यादा हो चुकी है।
कपड़ों से लेकर पापड़ और मसालों तक का काम
रूमा देवी का काम अब केवल कढ़ाई और हस्तशिल्प तक सीमित नहीं है। रूमा देवी फाउंडेशन और ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान के माध्यम से महिलाओं को कपड़ों के अलावा पापड़, साबुन, मसाले और अन्य उत्पाद तैयार करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
उनके तैयार किए गए पारंपरिक उत्पादों की मांग देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों में भी पहुंची है। उनका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को उनके घर के आसपास ही रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है, ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें।
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कौन हैं रूमा देवी?
रूमा देवी का जन्म 16 नवंबर 1988 को राजस्थान के बाड़मेर जिले के रावतसर गांव में हुआ था। इमरती देवी और खेताराम के घर जन्मीं रूमा देवी ने बेहद सीमित संसाधनों के बीच अपना सफर शुरू किया। उन्होंने अपने हुनर और मेहनत के जरिए पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पहचान दिलाई।
रूमा देवी राजस्थान सरकार द्वारा संचालित राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद की ब्रांड एंबेसडर भी हैं। इस मिशन से करीब 45 लाख महिलाएं जुड़ी हैं, जो घर पर पापड़, साबुन, बिस्कुट और अन्य उत्पाद बनाकर स्वरोजगार से जुड़ रही हैं। महिलाओं को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देने में भी रूमा देवी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
रूमा देवी की कहानी बताती है कि सीमित शिक्षा और मुश्किल परिस्थितियां किसी व्यक्ति के सपनों की राह को रोक नहीं सकतीं। 20 रुपये की पहली कमाई से शुरू हुआ उनका सफर आज हजारों महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का जरिया बन चुका है।


