अमेरिका की शोध संस्था World Resources Institute (WRI) और University of Maryland द्वारा संचालित Global Forest Watch (GFW) के अनुसार भारत ने 2001 से 2024 के बीच लगभग 23.1 लाख हेक्टेयर tree cover खो दिया। रिपोर्ट में इसे लगभग 7.1% गिरावट माना गया है।
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रिपोर्ट के अनुसार 2002–2024 के बीच लगभग 3.48 लाख हेक्टेयर humid primary forest समाप्त हुआ। केवल 2024 में ही लगभग 18,200 हेक्टेयर प्राकृतिक प्राथमिक वन नष्ट हुए।
विशेषज्ञों के अनुसार “primary forest” वे पुराने प्राकृतिक जंगल होते हैं जो तापमान नियंत्रण, वर्षा संतुलन और जैव विविधता के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र की संस्था Food and Agriculture Organization की GFRA 2025 रिपोर्ट भारत को उन देशों में शामिल करती है जहां कुल वन क्षेत्र में वृद्धि दर्ज हुई है। हालांकि FAO की गणना में plantation और commercial tree cover भी शामिल होते हैं। इसी कारण कई बार कुल “forest area” स्थिर या बढ़ता दिखाई देता है जबकि प्राकृतिक जंगल घटते रहते हैं।
मौसम पर दिख रहा असर :
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों की कटाई और प्राकृतिक वन क्षेत्र में कमी का असर अब भारत के मौसम में साफ दिखाई देने लगा है।
संभावित दुष्प्रभाव :
भीषण गर्मी और heatwave में वृद्धि, मानसून के पैटर्न में बदलाव, अचानक भारी बारिश और बाढ़,लंबे सूखे की स्थिति,
भूजल स्तर में गिरावट :
जंगलों में आग की घटनाओं में वृद्धि , साँस लेने के लिए भी ऑक्सीजन की कमी ।
विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े प्राकृतिक जंगल “प्राकृतिक एयर कंडीशनर” की तरह काम करते हैं। वे वातावरण में नमी बनाए रखते हैं, बादलों के निर्माण में मदद करते हैं और तापमान नियंत्रित करते हैं। पर्यावरण प्रेमी राकेश मिश्र ने भारत में लगातार ज़ारी फॉसिल फ्यूल के प्रयोग पर चिंता व्यक्त की जबकि विश्व के उन्नत देश उसे बंद कर रहे हैं ।
दुर्लभ जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों पर खतरा :
प्राकृतिक जंगलों की कमी का असर जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। कई दुर्लभ औषधीय पौधे और वनस्पतियाँ समाप्त होने के कगार पर बताई जा रही हैं। वहीं हाथी, बाघ, गिद्ध, हॉर्नबिल सहित अनेक वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास सिकुड़ता जा रहा है।
खनन और परियोजनाओं का बढ़ता दबाव :
पर्यावरण समूहों का आरोप है कि पिछले दशक में:खनन परियोजनाएँ,सड़क और रेलवे विस्तार,औद्योगिक कॉरिडोर,
ऊर्जा परियोजनाएँ , प्राकृतिक जंगलों पर भारी दबाव का कारण बनी हैं। विशेष रूप से मध्य भारत और आदिवासी क्षेत्रों में भारी वन कटाई जारी हैं।
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सरकारी आंकड़ों पर क्यों उठते हैं सवाल ?
कई पर्यावरण विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का कहना है कि सरकारी “forest cover” की परिभाषा में plantation और प्राकृतिक जंगलों को एक साथ गिना जाता है। आलोचकों का दावा है कि इससे वास्तविक प्राकृतिक जंगलों की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल वृक्षारोपण से सदियों पुराने प्राकृतिक जंगलों की भरपाई संभव नहीं है। प्राकृतिक जंगलों की मिट्टी, जल संतुलन और लाखों सालों की जैव विविधता को commercial plantation पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकते।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है ,
यदि प्राकृतिक जंगल लगातार घटते रहे, उद्योग और अर्थव्यवस्था के लालच में जंगल, जीवों,पानी और पहाड़ों को नष्ट किया जाता रहा तो आने वाले समय मे सांस लेने योग्य वातावरण को भी बचाना मुश्किल हो जाएगा ? विश्व के विकसित देश अपने शहरों के AQI को नियंत्रित रखते हैं लेकिन भारत ने जैसे अपने जंगलों से,पर्यावरण से दुश्मनी कर रखी है जिसका भारी खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना होगा ।