सुप्रीम कोर्ट ने जोजरी नदी में लगातार हो रहे प्रदूषण को लेकर मंगलवार को राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई. अदालत ने विशेष जांच दल (SIT) की जांच को “महज दिखावा (आईवॉश)” बताते हुए कहा कि विशेषज्ञ समिति की ताजा रिपोर्ट से स्पष्ट है कि नदी में अब भी “अत्यधिक एसिडिक” पानी बह रहा है, जबकि यह नदी जोधपुर और आसपास के जिलों के लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा है. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि यदि कोई राज्य अपने ही नागरिकों को जहर देना चाहता है, तो यह किसी भी राज्य सरकार के लिए सबसे शर्मनाक स्थिति है.
29 मई को कोर्ट ने दिए थे कई निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 29 मई को राजस्थान सरकार को कई निर्देश दिए थे. इनमें जोजरी नदी में औद्योगिक अपशिष्ट छोड़े जाने की जांच के लिए SIT का गठन, प्रदूषण रोकने के उपाय और औद्योगिक इकाइयों की निगरानी शामिल थी. अदालत ने उस समय यह भी कहा था कि राज्य की एजेंसियां नदी में खुलेआम छोड़े जा रहे औद्योगिक अपशिष्ट को रोकने में विफल रही हैं. जोधपुर, पाली और बालोतरा के कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है.
जोजरी नदी का पानी अम्लीय
मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संगीत लोढ़ा की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने मंगलवार को अपनी दूसरी रिपोर्ट पेश की. समिति ने स्थल निरीक्षण के आधार पर बताया कि जोजरी नदी के कई हिस्सों में अब भी तेज दुर्गंध आ रही है. और पानी अत्यधिक अम्लीय पाया गया. रिपोर्ट में कहा गया कि सफाई अभियान शुरू होने के बावजूद केवल नदी की सफाई पर्याप्त नहीं होगी. जब तक सभी वैध और अवैध अपशिष्ट निकासी बिंदुओं की पहचान कर उन्हें बंद या नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक प्रदूषण नहीं रुकेगा. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने SIT की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि आपकी SIT ने अब तक कुछ नहीं किया है. रिपोर्ट देखकर ऐसा लगता है कि जांच सही दिशा में नहीं बल्कि केवल दिखावे के लिए की जा रही है.
क्षेत्रीय अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया
राजस्थान सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने अदालत को बताया कि SIT का गठन पिछले महीने किया गया था, और उसने अपनी पहली रिपोर्ट विशेषज्ञ समिति को सौंप दी है. उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कुछ अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की है, और सीईटीपी से पानी के नमूने लेने और निगरानी के लिए जिम्मेदार क्षेत्रीय अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है.
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मांगा जवाब
हालांकि, अदालत इन जवाबों से संतुष्ट नहीं हुई. पीठ ने कहा कि विशेषज्ञ समिति ने 3 जुलाई को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जवाब मांगा था, लेकिन अब तक कोई उत्तर नहीं मिला. अदालत ने यह भी कहा कि राज्य के अधिकारियों ने समिति को उस छिपी हुई पाइपलाइन की जांच से रोकने का प्रयास किया, जिसके जरिए औद्योगिक अपशिष्ट नदी में छोड़ा जा रहा था. अदालत ने टिप्पणी की कि समिति को गलत रिपोर्टें दी जा रही है.
बांध से पानी नहीं छोड़ने का किया था अनुरोध
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि समिति ने राज्य सरकार से नदी में जमा विषैले कचरे और गाद को नीचे की ओर बहने से रोकने के लिए बांध से पानी नहीं छोड़ने का अनुरोध किया था, लेकिन इसके बावजूद पानी छोड़ दिया गया. कोर्ट ने कहा कि अब उसके निर्देशों के पालन के लिए राजस्थान के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा. मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी.
“नदी के किनारे स्थित सभी फैक्ट्रियां बंद”
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से कहा कि यदि अधिकारियों ने समिति के निर्देशों की अवहेलना की है तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि नदी के किनारे स्थित सभी फैक्ट्रियां फिलहाल बंद हैं, लेकिन जो उद्योग प्रदूषण नियंत्रण के उपाय अपनाने को तैयार हैं, उनके प्रतिनिधित्व पर विशेषज्ञ समिति विचार कर सकती है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ समिति ने इस संबंध में उद्योगों से बातचीत की है, और इस्पात उद्योगों ने नदी में शून्य तरल अपशिष्ट (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज-जेडएलडी) सुनिश्चित करने के लिए समयबद्ध योजना भी दी है. वहीं, वस्त्र उद्योगों को अदालत ने कहा कि यदि वे दोबारा संचालन चाहते हैं तो उन्हें विशेषज्ञ समिति को संतुष्ट करना होगा कि उनका संचालन अदालत के निर्देशों और व्यापक जनहित के अनुरूप होगा.
जहर देने की अनुमति नहीं दी जाएगी
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अब हम मुख्य सचिव से सौ प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित कराएंगे. किसी को भी नागरिकों को ज़हर देने की अनुमति नहीं दी जाएगी. ” साथ ही उद्योगों से कहा गया कि वे सबसे पहले नदी को विषैले अपशिष्ट से मुक्त कराने में सहयोग करें.
औद्योगिक पार्क की परियोजना पर रोक
विशेषज्ञ समिति के हस्तक्षेप के कारण काकानी में प्रस्तावित औद्योगिक पार्क की परियोजना भी फिलहाल रोक दी गई है. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह परियोजना नदी के उच्च बाढ़ क्षेत्र की 12.805 हेक्टेयर भूमि पर विकसित की जा रही थी और नदी से अनिवार्य बफर जोन भी नहीं छोड़ा गया था, जिससे नदी पुनर्जीवन की प्रक्रिया को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता था.
जोजरी नदी में औद्योगिक अपशिष्ट डाल रही थीं
समिति की पिछली रिपोर्ट में बताया गया था कि 1,500 से अधिक औद्योगिक इकाइयां जोजरी नदी, आसपास के खेतों और अन्य क्षेत्रों में औद्योगिक अपशिष्ट डाल रही थीं, जिससे बड़ी मात्रा में भूमि विषैले कचरे से प्रभावित हो गई. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बांडी नदी पर बना नेहड़ा बांध, जो कभी वर्षा जल संग्रहण के लिए बनाया गया था, अब औद्योगिक नाले में बदल चुका है, जिसके कारण स्थानीय पर्यावरण, कृषि, पशुधन और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. प्रदूषित पानी से सिंचित फसलों तथा वही पानी और चारा खाने वाले पशुओं में बांझपन, गर्भपात और त्वचा रोग जैसी समस्याएं सामने आई हैं. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में समाचार रिपोर्टों के आधार पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था. इसके बाद नवंबर 2025 में न्यायमूर्ति संगीत लोढ़ा की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित कर जोजरी-लूणी-बांडी नदी तंत्र के पुनर्जीवन और संरक्षण के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया था.


