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लद्दाख और आइस हॉकी
लद्दाख में आइस हॉकी खेल नहीं, परंपरा है। यहां बच्चों की पहली पिच जमी हुई नदी होती है और पहला स्टेडियम खुला आसमान। नूरजहां ने भी बिना प्रोफेशनल को, बिना महंगे गियर और सीमित संसाधनों में आइस हॉकी खेलना सीखा। यही उनकी ताकत बनी, जब उन्होंने कठिन परिस्थितियों में ढलने की आदत बना ली।
नूर जहां का संघर्ष
लद्दाख जैसे क्षेत्र में लड़कियों का खेलना आज भी आसान नहीं है। ठंड, सामाजिक सीमाएं और सुविधाओं की कमी इन सब को नूर जहां ने झेला। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने साबित किया कि हुनर लिंग नहीं देखता, मौका मांगता है।
राष्ट्रीय पहचान दिलाने का सफर
नूरजहां आइस हाॅकी को लद्दाख से बाहर निकालकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के सफर पर हैं। उन्होंने लोकल टूर्नामेंट, रीजनल लेवल मैच और महिला आइस हॉकी प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन कर लद्दाख की पहचान को नई धार दी। वह आज सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं, युवा लड़कियों के लिए रोल मॉडल हैं, जो दिखाती हैं कि पहाड़ों से भी सपने उड़ान भर सकते हैं।
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खेल के साथ सामाजिक बदलाव
नूरजहां का योगदान केवल गोल करने तक सीमित नहीं है। वह लड़कियों को ट्रेनिंग के लिए प्रेरित करती हैं। खेल को करियर मानने की सोच बदलती हैं औऱ लद्दाख की बेटियों को आत्मविश्वास देती हैं। उनका सफ़र बताता है, खेल सिर्फ़ शरीर नहीं, समाज भी मजबूत करता है।