आलोक शर्मा
(अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ एवं आईपीआर वकील, दिल्ली हाईकोर्ट )
28 फरवरी 2026 को ईरान पर शुरू हुए अमेरिका-इजरायल युद्ध ने वह कर दिखाया है जिससे भारत की हर सरकार हमेशा बचना चाहती थी। इस संकट ने एक कड़वी सच्चाई उजागर कर दी है: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) जैसे एक संकरे समुद्री मार्ग पर कितना अधिक निर्भर है।
भारत अपनी एलपीजी (LPG) का करीब 91% हिस्सा खाड़ी देशों से मंगवाता है, और 1 मार्च 2026 से हॉर्मुज जलडमरूमध्य वाणिज्यिक जहाजों के लिए बंद है। यह संकट अब केवल भू-राजनीतिक पन्नों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत की रसोई, पेट्रोल पंप और कारखानों तक पहुंच चुका है। एक “एनर्जी लॉकडाउन” — चाहे वह आधिकारिक हो या जमीनी हकीकत — अब कोई कल्पना नहीं बल्कि सच्चाई है।
यहाँ जानिए आने वाले दिनों में भारतीयों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:
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गैस सिलेंडर की किल्लत और आसमान छूती कीमतें
एलपीजी इस संकट का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। आपूर्ति रुकने के तीन हफ्तों के भीतर ही कई इलाकों में लंबी कतारें लगने लगी हैं। कीमतें भी बेकाबू हो रही हैं: 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर के दाम ₹60 और 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर के दाम ₹144 तक बढ़ चुके हैं। खबरों के मुताबिक, कालाबाजारी में सिलेंडर ₹4,000 तक बिक रहा है। सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए रिफिल की न्यूनतम अवधि 21 से बढ़ाकर 25 दिन कर दी है।
गैस वितरण पर सरकार का कड़ा नियंत्रण
भारत ने आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करते हुए 10 मार्च को ‘प्राकृतिक गैस (आपूर्ति विनियमन) आदेश, 2026’ लागू कर दिया है। इसके तहत चार-स्तरीय प्राथमिकता प्रणाली बनाई गई है:
पूरी आपूर्ति: घरेलू पीएनजी (PNG), वाहनों के लिए सीएनजी (CNG) और एलपीजी उत्पादन।
70% आपूर्ति: उर्वरक (Fertilizer) संयंत्रों को।
80% तक कटौती: विनिर्माण और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के लिए।
यदि संकट गहराता है, तो यह राशनिंग और सख्त होगी, जिससे देशभर की फैक्ट्रियों में काम ठप हो सकता है। एचएसबीसी (HSBC) के अनुसार, गैस की कमी से जीडीपी विकास दर में 0.25% की गिरावट आ सकती है।
बिजली कटौती की वापसी: डर और हकीकत
भारत का बिजली क्षेत्र फिलहाल तुलनात्मक रूप से सुरक्षित है। कोयले का पर्याप्त स्टॉक और 250 गीगावाट से अधिक की रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के कारण घरों में बड़े ब्लैकआउट की संभावना कम है। हालांकि, गर्मियों में बढ़ती मांग और सप्लाई चेन पर दबाव को देखते हुए, रेजिडेंशियल पावर कट की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
महंगाई की चौतरफा मार
एनर्जी लॉकडाउन सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर प्रहार है। 2 से 9 मार्च के बीच ब्रेंट क्रूड ऑयल $80 से बढ़कर $120 प्रति बैरल हो गया। इसका असर चेन रिएक्शन की तरह दिखेगा — परिवहन महंगा होगा, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी और डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा। खाड़ी देशों पर निर्भरता ने भारत को ‘इंपोर्टेड महंगाई’ के चक्रव्यूह में फंसा दिया है।
बिजली आधारित रसोई (Electric Kitchen) की ओर मजबूरी का रुख
एक बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिल रहा है। सिलेंडर की कमी के कारण लोग तेजी से इंडक्शन और इलेक्ट्रिक कुकटॉप अपना रहे हैं।
अमेजॉन पर इंडक्शन स्टोव की बिक्री 30 गुना और फ्लिपकार्ट पर 4 गुना बढ़ गई है। ब्लिंकिट और ज़ेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ये सामान आउट-ऑफ-स्टॉक हो रहे हैं। यह बिना किसी पूर्व योजना के होने वाला ‘एनर्जी ट्रांजिशन’ है, जो नीति से नहीं बल्कि मजबूरी से प्रेरित है।
होटल, रेस्तरां और छोटे व्यवसायों पर संकट
सरकार ने अस्थायी रूप से होटलों को ईंधन के रूप में ‘बायोमास’ (Biomass) इस्तेमाल करने की अनुमति दी है, जो बताता है कि संकट कितना गहरा है। ढाबे और रेस्तरां या तो कीमतें बढ़ा रहे हैं या बंद होने की कगार पर हैं।
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निष्कर्ष
भारत में एनर्जी लॉकडाउन का मतलब अचानक होने वाला अंधेरा नहीं है, बल्कि यह लंबी कतारों, महंगे सिलेंडरों, राशनिंग, औद्योगिक मंदी और महंगी थाली के रूप में सामने आएगा। यह संकट हमें याद दिलाता है कि भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए खाड़ी देशों पर निर्भरता कम कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में और तेजी से काम करना होगा।
(इस लेख में व्यक्त किए गए विचार,तथ्य लेखक के निजी हैं, इनसे न्यूज़ घंटी का सहमत या असहमत होना अनिवार्य नहीं है।”)


