गलत निदान और उपचार को चिकित्सकीय लापरवाही मानते हुए स्थायी लोक अदालत ने डॉक्टर, अस्पताल और संबंधित बीमा कंपनियों को कुल 23 लाख 36 हजार 774 रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है। फैसला 24 अगस्त को पीठासीन अधिकारी गंभीर सिंह, सदस्य योगेश कुमार शर्मा और रजनीकांत शर्मा की पीठ ने सुनाया।
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कैंसर की आशंका पर शुरू कर दी कीमोथैरेपी
अधिवक्ता राजेश पचौरी के मुताबिक, भरतपुर की पुष्प वाटिका कॉलोनी निवासी लक्ष्मी शर्मा अक्टूबर 2022 में पेट दर्द, बेचैनी और अन्य परेशानियों के चलते जयपुर के भगवान महावीर कैंसर अस्पताल पहुंची थीं। चिकित्सक ने उन्हें दूसरे केंद्र से जांच कराने की सलाह दी थी।
जांच रिपोर्ट में कैंसर की आशंका सामने आने के बाद चिकित्सक ने दोबारा जांच कराए बिना उपचार शुरू कर दिया। महिला को लगातार कीमोथैरेपी दी गई। इसके बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ।
मुंबई में जांच के बाद सामने आई असली बीमारी
उपचार से राहत नहीं मिलने पर परिजन जनवरी 2023 में लक्ष्मी शर्मा को मुंबई के टाटा स्मारक अस्पताल ले गए। वहां हुई जांच में कैंसर की बजाय तपेदिक की पुष्टि हुई। इसके बाद वृंदावन के श्री ब्रज सेवा समिति तपेदिक चिकित्सालय में भी बीमारी की पुष्टि हुई। तपेदिक का उपचार शुरू होने के बाद महिला के स्वास्थ्य में सुधार आया।
95 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति मांगी थी
महिला की ओर से उपचार खर्च के 15 लाख रुपये और मानसिक, शारीरिक व आर्थिक क्षति के लिए 80 लाख रुपये समेत कुल 95 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति मांगी गई थी। इसके अलावा 21 हजार रुपये मुकदमा खर्च की मांग भी की गई थी। अस्पताल और चिकित्सकों ने चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप से इनकार किया। उनका कहना था कि अस्पताल को उपचार के लिए केवल 29 हजार 750 रुपये का भुगतान किया गया था।
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अदालत ने 23.36 लाख रुपये देने का आदेश दिया
स्थायी लोक अदालत ने 15 लाख रुपये के उपचार खर्च के दावे को पर्याप्त बिल उपलब्ध नहीं होने के कारण स्वीकार नहीं किया। हालांकि महिला की ओर से 3 लाख 36 हजार 774 रुपये के उपचार संबंधी बिल पेश किए गए थे। अदालत ने मानसिक संताप, शारीरिक कष्ट और आर्थिक क्षति के लिए 20 लाख रुपये तथा उपचार के बिलों के 3 लाख 36 हजार 774 रुपये को मिलाकर कुल 23 लाख 36 हजार 774 रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। अदालत ने माना कि गलत निष्कर्ष के कारण महिला को अनावश्यक रूप से गंभीर उपचार से गुजरना पड़ा और उसे शारीरिक व मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ी।