वो जो दर्द छुपाकर जीती है। वो जो टूटकर फिर से खड़ी हो जाती है। वो जो सपने पूरे करने के लिए रात-रातभर जागकर मेहनत करती है। जिम में भारी वजन उठाने से लेकर परिवार की उम्मीदों के बोझ तक। अपनी जीवटता से महिलाएं हर क्षेत्र में मजबूती से पांव जमाए खड़ी हैं। इनकी मिसाल हमें राह दिखाती हैं। खेल, कारोबार, शिक्षा व तकनीकी के क्षेत्र में भी उनकी बुलंदी दूसरों के लिए अनुकरणीय है। इनमें से किसी ने सरकारी सेवा में चयनित होकर अपनी मेधा का लोहा मनवाया तो कोई अकेले ही बेटी का भविष्य गढ़ रही है। इनकी कहानी दूसरों के लिए भी प्रेरणास्रोत है।
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महिला सशक्तीकरण को लेकर तमाम बातें होती हैं, बरेली के इज्जतनगर की रहने वाली परवीन खान ने अपने दम पर इसे जी कर दिखाया है। जीवन के उतार-चढ़ाव और सामाजिक दबाव के बीच परवीन खान ने हार मानने के बजाय खुद को लोहे की तरह मजबूत बनाया। आज वह दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं। करीब 13 साल पहले परवीन खान का विवाह हुआ था, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के चलते उनका रिश्ता टिक नहीं सका। पति से अलग होने के बाद शुभचिंतकों ने उन पर दूसरी शादी के लिए काफी दबाव बनाया।
फरीदपुर के बहादुरपुर करोड़ गांव निवासी मीनाक्षी शर्मा अपने गांव से सेना में जाने वाली पहली बेटी हैं। इन दिनों सीएमपी (कॉर्प्स ऑफ मिलिट्री पुलिस) के पद पर कार्यरत हैं। वह तीन वर्षों तक शांति रक्षक दल का हिस्सा बनकर इस्राइल और सीरिया में शांति स्थापित करने में योगदान देकर लौटी हैं। मीनाक्षी ने बताया कि वह 2018 में बरेली कॉलेज से पासआउट होकर सेना में भर्ती हुईं। शांति रक्षक दल में प्रदेश की इकलौती महिला रहीं। मीनाक्षी ने बताया कि पिता को फेफड़ों का कैंसर है। अंतिम स्टेज होने की वजह से उनकी हालत ज्यादा खराब रहती है।
सरहद पर बलिदान पति को समर्पित की पुस्तक
बरेली कॉलेज के लाइब्रेरी साइंस विभाग की छात्रा रहीं शिवी के पति आशीष स्वामी शादी के पांच माह बाद ही सरहद पर देश की रक्षा करते हुए बलिदान हो गए। वह 58 राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू में तैनात थे। पति की मौत के बाद शिवी टूट गईं, लेकिन रुकी नहीं। उन्होंने देश के प्रति अपने पति के प्रेम को जाया न जाने देने का प्रण लिया। शिवी ने बताया कि उनके अंदर हमेशा ही यह भाव था कि मेरे बाद कोई मेरे देश भक्त पति को भूल न जाए इसलिए अपने अनुभवों को संजोने के लिए एक पुस्तक लिखी।
पति की मृत्यु के करीब डेढ़ साल तक अवसाद से जूझते हुए ये किताब को पूरा करना उनके लिए प्रेरणा बनी। इस पुस्तक को खूब पसंद किया जा रहा है। शिवी ने बताया कि इटली और स्वीडन से भी इस पुस्तक के लिए आर्डर आ चुका है। इस किताब के माध्यम से लोगों में उन संवेदनाओं को सामने लाना चाहती थीं जो एक फौजी का परिवार महसूस करता है।
बरेली की रहने वाली श्रद्धा खंडेलवाल के बनाए कपड़े अयोध्या में राम दरबार व मथुरा के बांके बिहारी मंदिर तक पहुंचे। श्रद्धा ने बताया कि उनके बनाए कपड़ों की तारीफ मंदिर ट्रस्ट के लोगों ने भी की है। उन्होंने बताया कि ये मेरे लिए एक बड़ी उपलब्धि रही है। अपने ऑनलाइन बिजनेस के माध्यम से शहर के बांके बिहारी व इस्कॉन मंदिर में भी भगवान को वस्त्र पहना चुकी हैं।
साउथ एशियन गेम्स में जीता स्वर्ण
सेपक टाकरा में अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपने खेल कौशल का लोहा मनवाने वालीं शिल्पी अब सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) में बतौर कांस्टेबल सेवाएं दे रही हैं। वह अब भी खेल से जुड़ी हुई हैं। 12 वर्ष की उम्र में खेल में कदम रखने वाली शिल्पी बताती हैं कि शुरुआती दिनों में संसाधन सीमित थे, लेकिन खेल में भविष्य बनाने का हौसला अडिग था। वर्ष 2023 में उनकी मां का निधन हो गया। इसके बाद वह कुछ समय तक काफी परेशान रहीं, लेकिन उन्होंने इस दुख को अपने खेल पर हावी नहीं होने दिया। इसके बाद और अधिक मेहनत शुरू कर दी। वह वर्ष 2018 में नेपाल में आयोजित साउथ एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक व नवंबर 2025 में आयोजित खेलो इंडिया बीच गेम्स में रजत और कांस्य पदक जीत चुकी हैं।
निशुल्क शिक्षा देकर समाज में परिवर्तन ला रहीं ऋतु
फर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां शहर की समाजसेविका ऋतु शाक्य के जीवन का मूल मंत्र बन गई हैं। करीब नौ साल पहले जब उन्होंने वूमेन एंड चाइल्ड वेलफेयर सोसाइटी की नींव रखी थी, तब उनके पास संसाधन कम थे और चुनौतियां बड़ी। लेकिन उनके इरादे फौलादी थे। महज 11 महिलाओं के साथ शुरू हुआ बेटी बचाओ का यह संकल्प आज एक वटवृक्ष का रूप ले चुका है।
ऋतु शाक्य घर पर ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को प्रतिदिन दो से तीन घंटे निशुल्क शिक्षा देती हैं। उनके इस निस्वार्थ भाव ने शहर की अन्य युवतियों को भी प्रेरित किया है। आज कनिका और सोनम जैसी छात्राएं कालीबाड़ी और सुभाषनगर जैसे इलाकों में उन बच्चों को ट्यूशन दे रही हैं, जो गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित रह जाते थे। वर्तमान में संगठन के मार्गदर्शन में 2000 से अधिक बच्चे अपने भविष्य की नींव मजबूत कर रहे हैं। शिक्षा के साथ-साथ संस्था महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई जैसे हुनर सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी ठोस काम कर रही है।
संस्था का सबसे अनूठा प्रयास बेटी के जन्म पर उत्सव मनाना रहा है। समाज की संकीर्ण सोच पर प्रहार करते हुए ऋतु और उनकी टीम ने बेटियों के जन्म पर सोहर गाने, लड्डू बांटने और माताओं को सम्मानित करने की परंपरा शुरू की। महिला संसद जैसे कार्यक्रमों के जरिए पिछड़े इलाकों की महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जा रहा है।


