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यह फैसला न्यायमूर्ति समीर जैन ने उस याचिका को खारिज करते हुए दिया, जिसमें एक गार्डन संचालक ने अपने मैरिज गार्डन की सीलिंग कार्रवाई को चुनौती दी थी। कोर्ट ने JDA ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि कृषि भूमि पर किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि चाहे वह मैरिज गार्डन ही क्यों न हो कानून का उल्लंघन है जब तक भूमि को व्यावसायिक श्रेणी में परिवर्तित नहीं किया जाता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने JDA अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि JDA पिक एंड चूज की नीति पर काम कर रहा है, यानी कुछ चुनिंदा गार्डन्स पर कार्रवाई की जा रही है जबकि कई प्रभावशाली लोगों के अवैध गार्डन्स को अनदेखा किया जा रहा है।
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हाई कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि JDA सभी अवैध मैरिज गार्डन्स के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करे। साथ ही चेतावनी दी कि अगर किसी अधिकारी जोन आयुक्त से लेकर JDA आयुक्त तक ने किसी को बचाने की कोशिश की या भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया, तो उनके खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि JDA ट्रिब्यूनल को JDA से जुड़े विवादों की सुनवाई करने का पूरा अधिकार है। भले ही ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट नहीं कहा जा सकता, लेकिन JDA अधिनियम, 1982 की धारा 83 के तहत उसे न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं। इससे यह स्थिति साफ हो गई कि ट्रिब्यूनल के आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं और उसके अधिकार क्षेत्र पर अब कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।