तीन सप्ताह से अधिक समय से आमरण अनशन पर शिक्षा सुधारक । हाईकोर्ट सक्रिय, विपक्ष का समर्थन, सुप्रीम कोर्ट बार अध्यक्ष की अपील, अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी नजर
नई दिल्ली | न्यूजघंटी विशेष: देश की शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और छात्रों के भविष्य को लेकर उठे सवाल अब राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुके हैं। सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक 28 जून से नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी प्रमुख मांग है कि नीट (NEET) सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें तथा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और पारदर्शी सुधार लागू किए जाएं।
वांगचुक का कहना है कि यह किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि करोड़ों छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने की लड़ाई है। उनका आरोप है कि बार-बार सामने आ रही परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों ने युवाओं का भरोसा कमजोर किया है और अब केवल जांच नहीं, बल्कि जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
तीन सप्ताह से अधिक समय से केवल पानी के सहारे, 9 किलो तक वजन कम
लगातार तीन सप्ताह से अधिक समय से जारी इस आमरण अनशन के दौरान वांगचुक ने केवल पानी के सहारे आंदोलन जारी रखा है।
चिकित्सकीय निगरानी में सामने आई जानकारी के अनुसार उनका करीब 9 किलोग्राम वजन कम हो चुका है और स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। डॉक्टरों ने इसे गंभीर स्थिति बताते हुए अनशन समाप्त करने की सलाह दी है, लेकिन वांगचुक ने स्पष्ट किया है कि जब तक छात्रों को न्याय और उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
वांगचुक की बिगड़ती हालत को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने और उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी पहुंचे
आंदोलन की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह भी जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त करते हुए उनसे भूख हड़ताल समाप्त करने की अपील की। हालांकि वांगचुक अपने रुख पर कायम रहे और कहा कि यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, बल्कि देश के छात्रों के भविष्य का प्रश्न है।
विपक्ष ने दिया समर्थन
विपक्ष के कई नेताओं ने आंदोलन का समर्थन किया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे, सांसद महुआ मोइत्रा, आतिशी, संजय सिंह, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव तथा किसान नेता राकेश टिकैत सहित कई नेताओं ने वांगचुक की मांगों को गंभीरता से लेने की अपील की। इनमें से कई नेताओं ने उनके स्वास्थ्य को देखते हुए अनशन समाप्त कर लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखने का भी आग्रह किया।
फिल्म जगत और बुद्धिजीवियों का भी साथ
अभिनेता अतुल कुलकर्णी ने एक दिन का सांकेतिक उपवास रखकर सरकार से संवाद शुरू करने की अपील की। वरिष्ठ अभिनेत्री शबाना आज़मी, ज़ीनत अमान, नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक शाह, सोनी राजदान, अभय देओल, अभिनेत्री श्रेया धनवंतरी, अभिनेता ओमी वैद्य, लेखक वरुण ग्रोवर और गीतकार स्वानंद किरकिरे सहित अनेक कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने भी आंदोलन के प्रति समर्थन व्यक्त किया और वांगचुक के स्वास्थ्य पर चिंता जताई।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए कई सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। सरकार का कहना है कि पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं के मामलों में जांच एजेंसियां कार्रवाई कर रही हैं तथा दोषियों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया जारी है। हालांकि सरकार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग स्वीकार नहीं की है।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर
वांगचुक के आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक कवरेज मिल रही है। Reuters ने इसे भारत में परीक्षा प्रणाली और युवाओं के बढ़ते असंतोष से जुड़ा महत्वपूर्ण आंदोलन बताया है। Associated Press (AP) ने इसे छात्रों के भविष्य और सरकारी जवाबदेही का बड़ा सवाल माना है। कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने टिप्पणी की है कि दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता भारत की वैश्विक साख और आर्थिक विकास से भी जुड़ी हुई है।
देशभर में उठ रहे सवाल
लगातार लंबा होता अनशन, गिरता स्वास्थ्य, हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, विपक्ष, कानूनी जगत, कलाकारों और बुद्धिजीवियों का समर्थन—इन सबके बीच यह आंदोलन अब केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, छात्रों के भविष्य और सरकार की जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुका है।
लोकतंत्र में असहमति का उत्तर संवाद और पुनर्विचार होता है। यदि व्यवस्था को लेकर इतने व्यापक स्तर पर सवाल उठ रहे हैं तो सरकार और आंदोलनकारियों—दोनों के लिए समाधान का रास्ता खुले मन से बातचीत, पारदर्शिता और संस्थागत सुधारों से होकर ही निकलता है ।


