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कौन हैं प्रोफेसर मंगला कपूर?
प्रोफेसर मंगला कपूर भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्रतिष्ठित विदुषी हैं, जिनका जीवन साहस, साधना और संकल्प का अद्भुत उदाहरण है। वे न केवल एक श्रेष्ठ संगीत शिक्षिका और शोधकर्ता हैं, बल्कि एक एसिड अटैक सर्वाइवर भी हैं, जिन्होंने अपने जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों को संगीत की शक्ति से पराजित किया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
प्रोफेसर मंगला कपूर एक कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखती हैं। जब वह सातवीं कक्षा में थीं, तब उनके साथ एक हादसा हुआ। बचपन में उनके चेहरे पर एसिड फेंक दिया गया, जिससे उन्होंने अपनी पहचान ही खो दी। उनकी स्थिति इतनी खराब थी कि अलग-अलग शहरों में मंगला के 37 सर्जरी हुईं।
कठिन संघर्ष से भरी शुरुआत
इतना ही नहीं, एक दुर्घटना में उनकी जांघ की दोनों हड्डियां भी चली गईं। इस घटना ने उनके शरीर और चेहरे को गंभीर रूप से प्रभावित किया, लेकिन उनका आत्मविश्वास, इच्छा-शक्ति और जीवन के प्रति दृष्टिकोण कभी कमजोर नहीं पड़ा। लंबे इलाज और शारीरिक पीड़ा के बावजूद उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। पिता ने उनका साथ दिया। स्कूल में बच्चे उनका मजाक उड़ाते, तरह तरह के नामों से बुलाते, तो कोई उन्हें देखकर डर जाता। ये सब मंगला के मन पर गहरी चोट देता। मन में कई बार आत्महत्या का विचार आया लेकिन उन्होंने अपने आप को मजबूत बनाए रखा।
मगंला की उपलब्धि
प्रोफेसर मंगला कपूर को बी.म्यूज, एम म्यूज में गोल्ड मेडल और पीएचडी की उपाधि प्राप्त है। संगीत से उन्हें जीने का सहारा मिला। उनके कई संगीत कार्यक्रमों में जब वह मीठी आवाज में गाती तो लोगों की भीड़ उन्हें सुनने के लिए उमड़ पड़ती। पीएचडी के बाद उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन दिया लेकिन यहां भी राहें आसान नहीं थीं। उनके आवेदनों को अस्वीकार कर दिया जाता, मजाक बनाया जाता लेकिन आखिर में बीएचयू के महिला महाविद्यालय में मंगला कपूर को लेक्चरर की पोस्ट मिल गई। उन्हें काशी की लता मंगेशकर की उपाधि भी मिल चुकी है।
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मंगला कपूर को मिला पद्मश्री सम्मान
प्रो. मंगला कपूर उन चुनिंदा हस्तियों में हैं, जिनका सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश भी है। एसिड अटैक जैसी अमानवीय हिंसा ने उनके शरीर को क्षति पहुंचाई, परंतु उनके मन, बुद्धि और संकल्प को नहीं तोड़ सकी। भारतीय शास्त्रीय संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, जीवन का पुनर्निर्माण बना। मंगला कपूर को मिला पद्मश्री सम्मान केवल उनकी संगीत साधना का नहीं, बल्कि उस साहस का सम्मान है।