हम अक्सर भूल जाते हैं कि हिंसा का न होना ही प्यार का सबूत नहीं है. प्यार का मतलब है- देखा जाना, समझा जाना और महसूस किया जाना. जब एक महिला की बातों को ‘फालतू’ समझकर टाल दिया जाता है या उसकी मानसिक थकान को ‘ड्रामा’ करार दिया जाता है, तब वह धीरे-धीरे खुद को एक ऐसे रिश्ते में पाती है जहाँ वह सिर्फ एक केयरटेकर बनकर रह गई है, पार्टनर नहीं.
परवरिश का अंतर
दरअसल, हमारी संस्कृति ने बेटियों को ‘त्याग की मूरत’ बनाना सिखाया. उसे सिखाया गया कि एडजस्ट करना ही उसकी सबसे बड़ी खूबी है. वह चुपचाप अपनी इच्छाएं मारती है ताकि घर की शांति बनी रहे. वहीं दूसरी ओर, लड़कों को शुरू से सिखाया गया कि ‘प्रोवाइडर’ (कमाऊ) बनना ही उनकी एकमात्र जिम्मेदारी है. उन्हें कभी यह नहीं सिखाया गया कि अपनी पत्नी के साथ बैठकर उसकी भावनाओं को समझना या उसके मौन को पढ़ना भी उनकी ड्यूटी का हिस्सा है. नतीजतन, पुरुष को लगता है कि वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है, जबकि उसकी पत्नी भावनात्मक कुपोषण का शिकार हो रही है. वह घर तो संभाल रही है, पर उस घर में उसका अपना कोई भावनात्मक कोना नहीं बचा है.
वह जख्म जो दिखता नहीं
भावनात्मक उपेक्षा (Emotional Neglect) बहुत ही शातिर तरीके से काम करती है. यह किसी घाव की तरह खून नहीं बहाती, बल्कि एक दीमक की तरह मन को खा जाती है. जब आप अपनी सबसे बड़ी खुशी या सबसे गहरा डर अपने जीवनसाथी को बताना चाहें और सामने से जवाब मिले, “अभी मैं मैच देख रहा हूँ” या “तुम हमेशा ऐसी ही बातें क्यों करती हो?” तो वह महिला धीरे-धीरे बोलना ही बंद कर देती है. यही वह पल होता है जब वह शादीशुदा होते हुए भी ‘अकेली’ हो जाती है. वह बिस्तर साझा करती है, छत साझा करती है, लेकिन अपना मन साझा करना छोड़ देती है.
वह क्या चाहती है?
वह आपसे कोई परियों की कहानी या महंगे गहने नहीं मांग रही. वह बस ‘प्रेजेंस’ (उपस्थिति) चाहती है. उसे चाहिए कि जब वह दिनभर की थकान के बाद आपके पास बैठे, तो आप उसके फोन की स्क्रीन से ज्यादा उसकी आँखों में दिलचस्पी दिखाएं. वह चाहती है कि आप उससे पूछें, “आज तुम्हारा दिन कैसा रहा?” और फिर वाकई में उसका जवाब सुनें.
रिश्ते को नए सिरे से देखने की जरूरत
शादी सिर्फ एक समझौता या सामाजिक अनुबंध नहीं है. यह दो इंसानों का भावनात्मक मिलन है. अगर आप एक पुरुष हैं और यह पढ़ रहे हैं, तो याद रखिए कि आपका अच्छा कमाना आपके परिवार को सुविधाएं तो दे सकता है, लेकिन आपकी पत्नी को खुशी और सुकून सिर्फ आपकी ‘संवेदना’ दे सकती है. रिश्ते की सार्थकता इस बात में नहीं है कि आप साथ रहते हैं, बल्कि इस बात में है कि आप एक-दूसरे के लिए कितना ‘उपलब्ध’ हैं. चुप्पी को मर्यादा समझना छोड़िए और संवाद की शुरुआत कीजिए. क्योंकि कोई भी महिला सिर्फ इसलिए शादी नहीं करती कि उसे एक छत मिल जाए, वह शादी करती है ताकि उसे एक ऐसा साथी मिले जिसके पास उसका दिल ‘सुरक्षित’ महसूस कर सके.