Mothers Surname For Child : कहते हैं कि दुनिया में मां का दर्जा खुदा से भी ऊपर है. नौ महीने कोख में पालने से लेकर, असहनीय दर्द सहकर जन्म देने और फिर रातों की नींद कुर्बान कर पालने तक, एक बच्चे के अस्तित्व का आधार उसकी मां होती है. लेकिन जैसे ही वह बच्चा इस दुनिया में कदम रखता है, समाज और कागजों पर उसकी पहचान ‘पिता’ के नाम और सरनेम (Surname) से तय हो जाती है. क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? क्यों मां का नाम अक्सर सिर्फ ‘पिता के नाम’ के बगल वाले कॉलम में सिमट कर रह जाता है?
पुरुष प्रधान समाज और विरासत का बोझ
हमारे समाज का ढांचा ऐतिहासिक रूप से ‘पितृसत्तात्मक’ (Patriarchal) रहा है. पुराने समय में संपत्ति, वंश और सामाजिक रुतबा केवल पुरुष से पुरुष को हस्तांतरित होता था. सरनेम सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक ‘टैग’ था जो यह बताता था कि यह बच्चा किस जमीन, किस कबीले या किस खानदान का वारिस है. चूंकि महिलाएं शादी के बाद दूसरे घर चली जाती थीं, इसलिए उनके सरनेम को ‘अस्थायी’ माना गया और पिता के सरनेम को ‘स्थायी’ पहचान दी गई.
हमारे समाज का ढांचा ऐतिहासिक रूप से ‘पितृसत्तात्मक’ (Patriarchal) रहा है. पुराने समय में संपत्ति, वंश और सामाजिक रुतबा केवल पुरुष से पुरुष को हस्तांतरित होता था. सरनेम सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक ‘टैग’ था जो यह बताता था कि यह बच्चा किस जमीन, किस कबीले या किस खानदान का वारिस है. चूंकि महिलाएं शादी के बाद दूसरे घर चली जाती थीं, इसलिए उनके सरनेम को ‘अस्थायी’ माना गया और पिता के सरनेम को ‘स्थायी’ पहचान दी गई.
पहचान का संकट
एक मां बच्चे को शारीरिक और भावनात्मक रूप से गढ़ती है, लेकिन जब पहचान की बात आती है, तो उसे ‘डिफ़ॉल्ट’ (Default) मान लिया जाता है. समाज का तर्क रहा है कि पिता का नाम लगने से बच्चे को ‘संरक्षण’ और ‘वैधता’ मिलती है. लेकिन क्या एक मां का प्यार और उसका संघर्ष बच्चे को सामाजिक पहचान देने के लिए काफी नहीं है? यह सवाल आज की आधुनिक महिलाएं और जागरूक समाज लगातार पूछ रहा है.
एक मां बच्चे को शारीरिक और भावनात्मक रूप से गढ़ती है, लेकिन जब पहचान की बात आती है, तो उसे ‘डिफ़ॉल्ट’ (Default) मान लिया जाता है. समाज का तर्क रहा है कि पिता का नाम लगने से बच्चे को ‘संरक्षण’ और ‘वैधता’ मिलती है. लेकिन क्या एक मां का प्यार और उसका संघर्ष बच्चे को सामाजिक पहचान देने के लिए काफी नहीं है? यह सवाल आज की आधुनिक महिलाएं और जागरूक समाज लगातार पूछ रहा है.
कानून क्या कहता है?
साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने ‘अक्षरा रेड्डी बनाम जे. रामा कृष्णा’ मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया था कि मां, बच्चे की एकमात्र प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) होने के नाते, बच्चे का सरनेम तय करने का पूर्ण अधिकार रखती है. कोर्ट ने कहा था कि पिता का सरनेम थोपना बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और मां के अधिकारों के खिलाफ हो सकता है.
साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने ‘अक्षरा रेड्डी बनाम जे. रामा कृष्णा’ मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया था कि मां, बच्चे की एकमात्र प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) होने के नाते, बच्चे का सरनेम तय करने का पूर्ण अधिकार रखती है. कोर्ट ने कहा था कि पिता का सरनेम थोपना बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और मां के अधिकारों के खिलाफ हो सकता है.
‘डबल सरनेम’ और नई पहचान
आजकल कई माता-पिता इस परंपरा को चुनौती दे रहे हैं. अब ‘हाइफ़नेटेड सरनेम’ (Hyphenated Surnames) का चलन बढ़ा है, जहाँ बच्चे के नाम के पीछे माता और पिता दोनों का सरनेम लगाया जाता है (जैसे: यश शर्मा-कपूर). यह न केवल समानता का प्रतीक है, बल्कि बच्चे को उसकी दोनों जड़ों से जोड़ता है. कुछ माता-पिता तो अब केवल मां का सरनेम लगाने का विकल्प भी चुन रहे हैं.
आजकल कई माता-पिता इस परंपरा को चुनौती दे रहे हैं. अब ‘हाइफ़नेटेड सरनेम’ (Hyphenated Surnames) का चलन बढ़ा है, जहाँ बच्चे के नाम के पीछे माता और पिता दोनों का सरनेम लगाया जाता है (जैसे: यश शर्मा-कपूर). यह न केवल समानता का प्रतीक है, बल्कि बच्चे को उसकी दोनों जड़ों से जोड़ता है. कुछ माता-पिता तो अब केवल मां का सरनेम लगाने का विकल्प भी चुन रहे हैं.
पहचान में समानता क्यों जरूरी?
सरनेम सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि सम्मान और अस्तित्व का हिस्सा है. अगर मां बच्चे के जीवन की पहली गुरु और रक्षक है, तो उसकी पहचान में मां का नाम शामिल होना ‘एहसान’ नहीं बल्कि उसका ‘हक’ है. यह बदलाव किसी को नीचे दिखाने के लिए नहीं, बल्कि दोनों अभिभावकों को बराबरी का सम्मान देने के लिए जरूरी है. हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ सिंगल मदर्स या कामकाजी महिलाओं ने अपने बच्चों के पासपोर्ट और स्कूल दस्तावेजों में केवल अपना नाम दर्ज कराने के लिए कानूनी लड़ाई जीती है. ग्लोबल ट्रेंड्स की बात करें तो स्पेन और लैटिन अमेरिकी देशों में ‘डबल सरनेम’ (माता और पिता दोनों का नाम) की कानूनी अनिवार्यता को एक मॉडल के रूप में देखा गया है.
सरनेम सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि सम्मान और अस्तित्व का हिस्सा है. अगर मां बच्चे के जीवन की पहली गुरु और रक्षक है, तो उसकी पहचान में मां का नाम शामिल होना ‘एहसान’ नहीं बल्कि उसका ‘हक’ है. यह बदलाव किसी को नीचे दिखाने के लिए नहीं, बल्कि दोनों अभिभावकों को बराबरी का सम्मान देने के लिए जरूरी है. हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ सिंगल मदर्स या कामकाजी महिलाओं ने अपने बच्चों के पासपोर्ट और स्कूल दस्तावेजों में केवल अपना नाम दर्ज कराने के लिए कानूनी लड़ाई जीती है. ग्लोबल ट्रेंड्स की बात करें तो स्पेन और लैटिन अमेरिकी देशों में ‘डबल सरनेम’ (माता और पिता दोनों का नाम) की कानूनी अनिवार्यता को एक मॉडल के रूप में देखा गया है.


