नए फैसले के तहत केवल ECC में बढ़ोतरी ही नहीं की गई है, बल्कि इसे लगातार प्रभावी बनाए रखने के लिए हर साल अप्रैल में 5 प्रतिशत की अनिवार्य बढ़ोतरी का प्रावधान भी किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समय के साथ इस शुल्क का असर कम न हो और प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास लगातार मजबूत बने रहें। सरकार का मानना है कि इस कदम से ट्रांसपोर्ट सेक्टर को धीरे-धीरे स्वच्छ और ग्रीन फ्यूल की ओर शिफ्ट होने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। खासतौर पर डीजल आधारित और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले कमर्शियल वाहनों पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
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क्या है नया रेट
नई अधिसूचना के तहत अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों पर शुल्क बढ़ाकर उन्हें ज्यादा भुगतान करना होगा। सरकार के फैसले के अनुसारकैटेगरी-2 (हल्के कमर्शियल वाहन) और कैटेगरी-3 (दो-एक्सल ट्रक) पर ECC 1,400 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये कर दिया गया है। वहीं कैटेगरी-4 (तीन-एक्सल ट्रक) और कैटेगरी-5 (भारी ट्रक) पर यह शुल्क 2,600 रुपये से बढ़ाकर 4,000 रुपये कर दिया गया है। इस तरह लाइट कमर्शियल व्हीकल और टू-एक्सल ट्रकों पर करीब 600 रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ा है, जबकि तीन-एक्सल और भारी ट्रकों के लिए यह बढ़ोतरी 1,400 रुपये तक पहुंच गई है।
पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि यह कदम सिर्फ राजस्व बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि राजधानी की हवा को बेहतर बनाने के उद्देश्य से लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब दिल्ली अनावश्यक वाहनों के प्रदूषण का बोझ नहीं उठा सकती। मंत्री ने कहा, “ECC में बढ़ोतरी के जरिए साफ संदेश दिया गया है कि जो भी प्रदूषण फैलाएगा, उसे ज्यादा कीमत चुकानी होगी।” सरकार का मानना है कि इस फैसले से डीजल और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की एंट्री कम होगी, वहीं स्वच्छ और ग्रीन फ्यूल आधारित वाहनों को बढ़ावा मिलेगा।
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सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च को नए ECC रेट्स को मंजूरी देते हुए इसे संतुलित और न्यायसंगत करार दिया। कोर्ट ने हर साल अप्रैल में 5 प्रतिशत बढ़ोतरी के प्रावधान को भी सही ठहराया। साथ ही निर्देश दिया कि जरूरी सामान लेकर आने वाले वाहनों को छोड़कर बाकी भारी वाहन शहर में प्रवेश करने के बजाय बाहरी एक्सप्रेसवे का उपयोग करें, ताकि राजधानी में ट्रैफिक और प्रदूषण दोनों को कम किया जा सके। सरकार के अनुसार, वर्ष 2015 में लागू किया गया ECC समय के साथ अपनी प्रभावशीलता खोने लगा था। महंगाई और बदलती परिस्थितियों के चलते इसका असर कम हो गया था, जिसके चलते दरों में संशोधन जरूरी हो गया।